गुरुवार, 25 जून 2015
शनिवार, 17 मई 2014
मेरे एक दोस्त इसे ‘सुनामी‘ बता रहे थे, वह कह रहे थे यह ऐतिहासिक है। उनका मानना है कि इतने ‘जबर्दस्त‘ जनादेश का मतलब है कि अगले 15-20 साल के लिए भाजपा को देश पर राज करने का अधिकार मिल गया है और हारने वाली कांग्रेस हमेशा के लिए खत्म हो चुकी है। मैंने उनसे पूछा कि आपको पता है कि भारतीय चुनाव के इतिहास में इसके पहले ‘सुनामी‘ कब-कब आई थी। तो उन्होंने कहा, ”मैं तो अयोध्या आंदोलन के दौर में पला-बढ़ा हूं, मैं उसके पहले का इतिहास नहीं जानता और जानना भी नहीं चाहता। मेरे संस्कार ज्यादा पढ़ने-लिखने से मना करते हैं क्योंकि अगर मैंने ज्यादा पढ़ लिया तो मेरे ज्ञान चक्षु खुल जाएंगे, फिर मैं ‘हे मोगैम्बो‘ की तरह किसी एक विचारधारा की गुलामी कैसे करूंगा?“ मैंने कहा कि कोई बात नहीं, आपकी तरफ से मैं ही इतना कष्ट कर लेता हूं। तो दोस्तों 2014 के चुनाव में बीजेपी के 283 सीट हासिल करने को आधार पर मैंने पता लगाने की कोशिश की आखिर ऐसी सुनामी इस देश में पहले कितनी बार आई थी।
शुरुआत करते हैं पहले आम चुनाव 1951-1952 से- इसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कुल 489 सीटों में से 364 सीटें जीत कर और 45 फीसदी वोट हासिल कर सत्ता में आई थी।
दूसरे आम चुनाव 1957- कुल 490 लोक सभा सीटों में से कांग्रेस को 371 सीट और करीब 48 फीसदी वोट
तीसरे आम चुनाव- कुल 494 सीटों में से कांग्रेस को 361 सीट और 45 फीसदी वोट
चैथे चुनाव 1967- कुल 520 सीटों में से कांग्रेस को 283 सीटें हासिल हुईं
पांचवें लोक सभा चुनाव 1971- कुल 518 सीटों के चुनाव में कांग्रेस को 352 सीटें और 44 फीसद वोट हासिल हुए।
छठे लोक सभा चुनाव- जनता पार्टी को 345 सीटें और 52 फीसदी वोट मिले, कांग्रेस को करीब 217 सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा
सातवें लोक सभा चुनाव 1980- कुल 542 सीटों में से कांग्रेस को 374 सीटें हासिल हुईं
आठवें लोक सभा चुनाव 1984- राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को कुल 533 सीटों में से 414 सीटें और 51 फीसदी वोट हासिल हुए। इतनी सीटें अपने आप में एक रिकाॅर्ड हैं, लेकिन इसे भी ‘सुनामी‘ नहीं कहा गया, बल्कि इंदिरा गांधी की मौत के बाद उपजी सहानुभूति लहर बताया गया।
हालांकि, यह नहीं पता चल पाया कि उक्त चुनावों में नेताओं के पीआर और चुनाव प्रचार व मार्केटिंग पर कितने हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाते थे। यह भी नहीं पता चल पाया कि तब उद्योगपति, मीडिया पार्टियों को कितना सहयोग करते थे, कोई अपना हेलीकाॅप्टर देता था या नहीं। एक्जिट पोल, सर्वे वगैरह तो होते नहीं थे, दिन-रात चीखने वाले चैनल भी नहीं थे, फिर मीडिया से टाई-अप कैसे किया जाता था, इसकी भी कोई जानकारी नहीं मिल पाई है।
यह सब आंकड़े सुनने से मेरे दोस्त का सिर चक्कर खाने लगा। उन्होंने कहा कि आप मेरे जन्म से पहले का इतिहास क्यों बताते हैं, इतिहास वहीं से शुरू होता है जबसे मैं पैदा होता हूं, देखना मित्र कांग्रेस बिल्कुल खत्म है। मैंने पूछा कि कई दशकों तक विपक्ष में रहने और 1984 में महज दो सीटों पर सिमट जाने के बावजूद जब भाजपा (जनसंघ) खत्म नहीं हुई तो कांग्रेस कैसे खत्म हो जाएगी। तो उनका कहना था कि बीजेपी नहीं खत्म हो सकती क्योंकि उसे आसाराम, बाबा रामदेव जैसे तमाम संतों का आशीर्वाद हासिल है, खत्म होने का अधिकार सिर्फ कांग्रेस और केजरीवाल को है।
रविवार, 5 जनवरी 2014
ईस्ट इंडिया कंपनी का जमाना
कब का गया साहब
दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उभार और उसके लोकलुभावन कदमों
से शेयर बाजार में निवेश करने वाले एफआईआई बेचैन हैं। खासकर
बिजली कंपनियों के ऑडिट और टैरिफ में कटौती जैसे आप के कदमों
से निवेशकों में डर समा गया है। दिल्ली सरकार के लोकलुभावन कदमों
और आप के कॉरपोरेट विरोधी चरित्र की वजह से पूरा कॉरपोरेट सेक्टर
सहमा हुआ है। असल में आम आदमी पार्टी का विकास एक एनजीओ
की बुनियाद पर हुआ है और उसके कार्यकर्ताओं में गरीब-गुरबे से लेकर
अच्छी सैलरी कमाने वाले मध्यम वर्गीय नौजवान तक शामिल हैं। इसके
विचारकों में समाजवादी और वामपंथी धारा के लोग ज्यादा दिखते हैं,
इसलिए इसका चरित्र कंपनी, कॉरपोरेट विरोधी ज्यादा दिख रहा है। पर
आप को समझना होगा कि देश को ईस्ट इंडिया कंपनी के चंगुल से बाहर
हुए जमाना हो गया है और आज 'कंपनी' का वैसा शोषक चरित्र नहीं
है जैसा कि ईस्ट इंडिया के जमाने में रहा है। आज अगर कुछ कंपनियां
जालसाजी, चोरी, बेईमानी या शोषण में लिप्त पाई गई हैं तो ज्यादातर
कंपनियों ने देश-विदेश के करोड़ों नौजवानों को रोजगार भी दिए हैं, उन्हें
पेशेवर बनाया है। सच तो यह है कि धीरूभाई अंबानी जैसे गुजरात के
एक आदमी ने अपनी मेहनत से देश की सबसे बड़ी निजी कंपनी खड़ी
की है। इसलिए आम आदमी पार्टी को समूचे कंपनी, कॉरपोरेट जगत को
चोर-बेईमान समझने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा। हाल में
कॉरपोरेट जगत के कई बड़े अधिकारियों के आप ज्वाइन करने के बाद
उम्मीद है कि पार्टी में कॉरपोरेट के बारे में समझ थोड़ी बढ़ेगी।
(बिज़नेस भास्कर में मेरे द्वारा लिखा गया सम्पादकीय)
गुरुवार, 19 दिसंबर 2013
पूरी दिल्ली बनी पंचायत
दिल्ली में सरकार बनाने के लिए उहापोह की स्थिति के बीच आम आदमी
पार्टी ने जनता का मत जानने के लिए लाखों चिट्ठियां भेजने का निर्णय
लिया है। इसके अलावा एसएमएस, फोन कॉल और फेसबुक के माध्यम
से भी इस बारे में जनता से राय मांगी जा रही है कि 'आप' दिल्ली में
सरकार बनाए या न बनाए। संचार के विकसित साधनों और सोशल
मीडिया के इस जमाने में 'आप' पहले भी कई तरह के अनूठे प्रयोग
करती रही है, लेकिन सरकार बनाने के लिए जनमत जानने का उसका
यह तरीका भारतीय लोकतंत्र में पहली बार हो रहा है। अगर यह प्रयोग
सफल रहता है तो भारत वास्तव में इस मामले में लोकतांत्रिक देशों का
अगुआ बन जाएगा। कई लोगों की यह राय है कि एक बार जनता अपना
मत दे चुकी है, तो फिर उसकी राय जानने की यह कवायद वास्तव में
जनता को बेवजह तंग करने जैसा ही है। हालांकि, अभी तक त्रिशंकु
विधानसभा या लोकसभा की स्थिति में जिस तरह की खरीद-फरोख्त का
दौर चलता रहा है, उसे देखते हुए 'आप' की यह कवायद भी राहत देने
वाली ही है। अच्छी बात यह है कि अब जनता की भूमिका सिर्फ चुनाव
होने तक सीमित नहीं रह जाएगी, बल्कि सरकार बनाने में भी उसकी
राय महत्वपूर्ण होने जा रही है। देश में बढ़ते युवा मतदाताओं, जो ज्यादा
शिक्षित और टेक्नोफ्रेंडली है, और संचार क्रांति की वजह से इस तरह के
प्रयोग करने अब आसान हो गए हैं। तो पहले जैसे ग्राम पंचायतों में हाथ
उठवा कर जनता की राय ली जाती थी, अब संचार साधनों और सोशल
मीडिया की बदौलत पूरा एक प्रदेश या देश ही पंचायत में तब्दील हो सकता है।
(बिजनेस भास्कर में 19 दिसंबर को प्रकाशित मेरे द्वारा लिखा गया संपादकीय )
बुधवार, 27 नवंबर 2013
ईरान और दुनिया के छह बड़े देशों के बीच इस शनिवार को जेनेवा में नाभिकीय कार्यक्रमों पर हुआ अंतरिम समझौता मध्य एशिया और दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक राहत भरी खबर है। इस खबर के असर से ही सोमवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल भारी गिरावट के साथ 108 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया और इसके असर से भारत में बीएसई सेंसेक्स में 388 अंकों का उछाल देखा गया। इस समझौते से खासकर भारत, चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, टर्की और ताइवान को फायदा हो सकता है, जो अब भी ईरान से तेल खरीद रहे हैं। भारत को इसका कितना फायदा होगा और फायदा मिलने में कितना समय लगेगा, यह अभी साफ नहीं है। ईरान पर प्रतिबंध के पहले वहां से 23 देश तेल आयात करते थे, लेकिन 2012 में लगे प्रतिबंध के बाद सिर्फ उक्त छह देश ही तेल का आयात कर रहे हैं। हालांकि, भारत जैसे कई देशों ने आयात में भारी कटौती भी कर दी थी। अभी यह अंतरिम समझौता है, लेकिन भारत जैसे देशों को इस बात के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना चाहिए कि यह एक पूर्ण समझौते में बदले और ईरान के ऊपर लगे तेल निर्यात के सभी महत्वपूर्ण
प्रतिबंधों को खत्म किया जाए। इससे जो प्रतिबंध हटेंगे उससे ईरान को तेल बेचने पर करीब 4.2 अरब डॉलर का राजस्व हासिल होगा। यह समझौता यदि कारगर होता है और इसके तहत गहन बातचीत की प्रक्रिया चलती है तो यह सबके लिए काफी फायदे की बात होगी। लेकिन कोई अंतिम समझौता नहीं हो पाया तो इसके
बाद महाशक्तियों को ईरान पर सैन्य कार्रवाई करने का पुख्ता बहाना मिल जाएगा कि अब कोई रास्ता बचा ही नहीं है। जो भी हो, भारत को ऐसे प्रयास का तहे दिल से समर्थन करना चाहिए क्योंकि ऊर्जा जरूरतों के लिए हम पूरी तरह से आयातक देश हैं और इस क्षेत्र में स्थिरता आने से ईरान सहित अन्य देशों में भारत के निर्यात को भी मजबूती मिलेगी। खासकर ईरान में जहां प्रतिबंध लगाए जाने के बाद निर्यात पर काफी बुरा असर पड़ा है। वर्ष 2012-13 में ईरान को भारतीय निर्यात महज 3.7 अरब डॉलर का हुआ है जो कि क्षमता से बहुत कम है। इस समझौते से भारत को कितना फायदा होगा इसे लेकर जानकारों में अलग-अलग राय है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने यह साफ किया है कि इससे तेल व गैस पाइपलाइन के बारे में ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि पाइपलाइन से जुड़े कई ऐसे मसले हैं जिनको सुलझाने में लंबा समय लग सकता है। ईरान से आने वाले टैंकरों के बीमा पर भी यूरोपीय संघ ने रोक लगा दी थी, लेकिन अब इस तरह के प्रतिबंध भी हट जाएंगे जिसके बाद भारत व टर्की जैसे देशों को तेल आयात सुलभ हो जाएगा। भारतीय तेल मार्केटिंग कंपनियों का कहना है कि इससे वे ईरानी तेल आसानी से मंगा सकेंगी, लेकिन ईरान से तेल आयात तात्कालिक तौर पर तो बढऩा संभव नहीं लगता। भारत ने वर्ष 2011-12 में ईरान से 1.74 करोड़ टन और 2012-13 में महज 1.4 करोड़ टन क्रूड ऑयल का आयात किया था। ऐसा माना जा रहा है कि ईरान सरकार पर दबाव बनाने के लिए भारत तेल आयात में कटौती अभी बरकरार रखेगा।
(26 नवंबर 2013 को बिज़नेस भास्कर में मेरे द्वारा लिखा गया सम्पादकीय )
शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012
यूपी में दो हफ्ते से ज्यादा रहा और इसमें से करीब दस दिन अपने गांव धानी बाजार, महराजगंज में रहा. इस दौरान गांव की धीमी, सुकून भरी जिंदगी के पूरे मजे लेने की कोशिश करता रहा. अखबार कम ही पढ़ता था, टीवी बिल्कुल नहीं देखा और इंटरनेट पर बस जरूरी ई-मेल करने और कभी-कभी फेसबुक में झांक लेने के अलावा कुछ खास नहीं कर पाया. लेकिन दिल्ली आते ही यहां बलात्कार का घिनौना मामला सुनने में आया और दिल दहल गया. फिर से जिंदगी महानगरीय हलचल से आक्रांत हो गई.
इसी हफ्ते सोमवार को जब वापस आने की तैयारी कर रहा था, सुबह-सुबह पुराने पत्रकार मित्र विजय शंकर (आज तक) का फोन आया. उन्होंने कहा, ”दैनिक जागरण के साहित्य वाले पेज पर गीतांजलि श्री की किताब ‘यहां हाथी रहते थे‘ के बारे में जानकारी छपी है, तुमने इस शीर्षक से कोई कविता लिखी थी, देख लो कहीं चोरी का कोई मामला तो नहीं है.“ असल में करीब एक दशक पहले मैं कविताएं लिखने में सक्रिय था और तब ऐसी ही मेरी दो कविताएं देश की शीर्ष साहित्यिक पत्रिका ‘हंस‘ में छपी थीं. इनके शीर्षक हैं-‘दिल्ली में हाथी रहते हैं‘ और ‘न लिखने का कारण‘. दोनों बहुत छोटी कविताएं थीं. उस दिनो मैं छोटे शहर, गांव से हाल में महानगर आया एक संवेदनशील युवक था और दिल्ली की गलाकाट प्रतिस्पर्धा वाले समाज में काफी असहज महसूस करता था. कई ऐसी बातें हुईं, जिससे मेरे मन में यह सवाल उठने लगा कि दिल्ली में इंसान रहते हैं या नहीं. तभी यमुना पुल पर एक बोर्ड दिख गया और इसी बोर्ड से मुझे कविता लिखने की प्रेरणा मिली.
खैर, दैनिक जागरण का वह पेज दिल्ली आने से पहले देख नहीं पाया और यहां भी ई-पेपर पर वह मिल सका. असल में गीतांजलि श्री की किताब एक कहानी संग्रह है और मैंने तो इससे मिलते-जुलते शीर्षक से एक कविता भर लिखी थी. वैसे भी मेरा यह मानना है कि शीर्षक की चोरी कोई चोरी नहीं होती, चोरी तो तब होती है जब कोई शीर्षक बदलकर पूरा कन्टेंट अपने नाम से छाप ले (जैसा कि मेरे एक पूर्व संपादक ने किया था, उन्होंने क्रिकेट पर लिखे मेरे एक आलेख की हेडिंग बदलकर पूरा मैटर वैसे ही रखते हुए अपने नाम से एक कम चलने वाली पत्रिका में छपवा ली थी). मैंने भी अपनी कविता के शीर्षक की प्रेरणा आइटीओ से लक्ष्मीनगर जाने वाली यमुना पुल पर लगे एक बोर्ड से ली थी. उन दिनों यमुना पुल के पास पुश्ते पर बहुत बड़ी झुग्गी बस्ती हुआ करती थी और वहां कई लोग हाथी पाले रहते थे. इन हाथियों को शादी आदि में किराए पर देने का बिजनेस था, जिसे प्रचारित करने के लिए ‘यहां हाथी रहते हैं‘ लिखे हुए कई बोर्ड दिख जाते थे.
आज जब दिल्ली में बलात्कार को लेकर यहां के पूरे समाज पर सवालिया निशान लग रहे हैं. ऐसे में मेरी यह कविता फिर से प्रासंगिक नजर आ रही है. अपने दोस्तों के लिए अपनी इस छोटी सी कविता को फिर से पेश कर रहा हूं.
दिल्ली में हाथी रहते हैं
‘यहाँ हाथी रहते हैं‘,
यमुना पुल से गुजरते ही दिख जाता है बोर्ड।
यहां भालू रहते हैं, यहां बंदर रहते हैं,
ऐसा भी बोर्ड होगा कहीं दिल्ली में,
शायद चिडि़या घर के पास।
‘यहां इंसान रहते हैं‘,
ऐसा बोर्ड भी दिल्ली में कहीं है क्या?
आपको दिखे तो बताना...
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रविवार, 6 मई 2012
शनिवार, 26 जून 2010
किसी टीआरपी का हिस्सा नहीं है मेरा गांव
देश के 100 सबसे पिछड़े जिलों में से एक महाराजगंज (यूपी) के सबसे पिछड़े इलाकों में है मेरा गांव, धानी बाजार। वास्तव में यह एक गांव नहीं बल्कि छोटा सा बाजार है, ब्लॉक मुख्यालय है। पिछले दस साल में जबसे मैं दिल्ली आया हूं, मेरे गांव में परिवर्तन और विकास बहुत से तेजी से हो रहा है। हम बचपन में जो सपने देखते थे, वे सब लगभग पूर हो गए हैं या उन पर काम चल रहा है। राप्ती नदी पर पक्का पुल बन रहा है, बिजली का सब स्टेशन बन रहा है, 30 बेड का हॉस्पिटल बन रहा है। गांव की गली-गली आरसीसी की सड़क में तब्दील हो चुकी है। वैसे तो इस बार गांव छोटे भाई की शादी में शरीक होने होने के लिए गया था, पर इस व्यस्त कार्यक्रम के बीच भी गांव मंे होने वाले तेज changes की झलक दिख ही गई। मेरा गांव संचार क्रांति का हिस्सा बन चुका है, घर-घर मंे मोबाइल फोन है, इंटरनेट कैफे खुल चुके हैं। इध्र एक नई क्रांति जो दिख रही है वह है डीटीएच की। घर-घर जिस तरह से डीटीएच की छतरियां दिख रही थीं उससे मुझे लगता है कि कम से कम 100 घरों में तो डीटीएच कनेक्शन लगा ही होगा। यही नहीं कई संयुक्त परिवारों के यहां तो एक ही घर में 3-4 डीटीएच छतरी दिख रही है (ऐसा ही एक घर तस्वीर में दिख रहा है)। पर खबरिया या मनोरंजन चैनलों के लिए जो टीआरपी तय की जाती है उसमें मेरे गांव के लोग कहीं नहीं हैं। हां, यह डीटीएच कंपनियां के लिए अध्ययन का विषय जरूर हो सकता है। इस छोटे से कस्बे नुमा गांव में टीवी के अलावा मनोरंजन का कोई और साधन नहीं है, इसलिए इस गांव के लोग महीने में डीटीएच का दो-तीन सौ रपया खर्च करने को तैयार हैं। गांव के इन घरों में दोपहिया, चारपहिया वाहन, टीवी, मोबाइल, कूलर, डीवीडी, इनवर्टर तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं। ग्रामीण बाजार में पैठ बनाने की कोशिश कर रही उपभोक्ता कंपनियों को मेरे गांव का अध्ययन जरूर करना चाहिए।
ऐसा भारतीय स्टेट बैंक के इतिहास में शायद ही कभी हुआ हो या हुआ भी होगा तो ऐसे कुछ ही उदाहरण होंगे। गांव रहने के दौरान मुझे खबर मिली कि भारतीय स्टेट बैंक के सामने जनता रोड पर चक्का जाम कर रही है। यह चक्का जाम इस वजह से कि भारतीय स्टेट बैंक पर इतनी भीड़ हो गई है और धन की निकासी इतना ज्यादा हो रही है कि बैंक लोगों को पैसा देने में असमर्थ हो गया है। लग्न के महीने में जब शादी आदि की जरूरतों के लिए लोगों को पैसा निकालना बहुत जरूरी होता है तो पैसा न मिलना उनके लिए बहुत बड़ी बात है। बैैंक मैनेजर ने प्रति दिन कुछ करोड़ की जो लिमिट अपनी शाखा के लिए ऊपर बताई थी वह पैसा दोपहर तक ही खत्म हो जाता था। लग्न की वजह से पैसा जमा करने वाले नहीं बल्कि निकालने वाले ही ज्यादा आते थे। यह सब देख मैनेजर के हाथपांव फूल गए, प्रशासन और बैंक के उच्च अधिकारियों ने मिलकर समस्या को दूर करने का आश्वासन दिया और चक्का जाम हटाया गया। बैंक अधिकारियों का कहना था कि मनरेगा की वजह से उनकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं। मनरेगा योजना के मजदूरों को हर दिन बैंक से मजदूरी का भुगतान करना पड़ता है जिसकी वजह से भारी भीड़ हो जाती है।
मेरे गांव में सिर्फ भारतीय स्टेट बैंक की ही शाखा है। एक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक भी है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के निवेश का बड़ा हिस्सा बैंकों में ही जाता है। पता नहीं कोई और बैंक वहां अपनी शाखा खोलने का विचार क्यों नहीं करता।
मनरेगा से नाराज
रविवार, 9 नवंबर 2008
भारत को भी चाहिए एक ओबामा
अमेरिका ने अपने सर्वोच्च और सबसे ताकतवर पद पर एक अश्वेत को चुनकर २१वीं सदी में एक नई क्रांति की है। अमेरिका के पीछे चलने वाले भारत को भी अब इस तरह का उदाहरण पेश करना चाहिए। क्या भारत में कोई बन सकता है ओबामा ? इस विषय पर एनडीटीवी के एंकर रवीश जी ने बहुत ही उम्दा कार्यक्रम पेश किया। हालाँकि , इसमे शामिल किसी भी गेस्ट ने यह नहीं माना कि अभी भारत में कोई ओबामा बन सकता है ।



